अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पंचायत परिसीमन एवं दावा-आपत्ति दर्ज करने से संबंधित आपकी शंकाओं का समाधान
पंचायत क्षेत्रों हेतु निर्धारित मानक जनसंख्या में वृद्धि हो जाने तथा नगर निकाय क्षेत्रों के विस्तार के कारण त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं की इकाइयों (ग्राम पंचायत, वार्ड, पंचायत समिति व जिला परिषद् निर्वाचन क्षेत्रों) की सीमाओं का पुनः निर्धारण ही परिसीमन कहलाता है।
वर्तमान में (राज्य सरकार द्वारा) 2011 के जनगणना के आंकड़ों के आधार पर त्रिस्तरीय पंचायती राज की इकाइयों के परिसीमन का निर्णय लिया गया है।
पूर्व में 1991 के जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वर्ष 1993-1994 में पंचायतों का परिसीमन कराया गया था।
जिला दंडाधिकारी द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग के निदेशन, नियंत्रण व पर्यवेक्षण में परिसीमन का कार्य कराया जाना है।
दावा/आपत्ति प्रखंड विकास पदाधिकारी को offline या online दिया जा सकता है।
हाँ, परिसीमन की प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी है। परिसीमन के अवसर पर आप अपना सुझाव संबंधित पदाधिकारी को दे सकते हैं।
पंचायत परिसीमन से समान प्रतिनिधित्व एवं पंचायतों का संतुलित एवं प्रभावी गठन संभव होता है।
परिसीमन भारतीय संविधान, बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006, बिहार पंचायत निर्वाचन नियमावली, 2006 के सुसंगत प्रबधानो के अधीन राज्य निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाना है।
परिसीमन में जनसंख्या की यथासंभव समानता, भौगोलिक निरंतरता, प्राकृतिक एवं प्रशासनिक सीमाओं तथा राजस्व ग्रामों की एकरूपता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
सामान्य क्षेत्रों में ग्राम पंचायत की मानक जनसंख्या लगभग 7,000 होती है| दुर्गम क्षेत्रों के लिए अलग मानदंड निर्धारित हैं।
सामान्यतः राजस्व ग्राम का विभाजन नहीं किया जाता। केवल विशेष परिस्थितियों में जनसंख्या एवं भौगोलिक आवश्यकता के आधार पर विभाजन किया जा सकता है। राजस्व ग्राम का तभी विभाजन किया जाता है जब उस ग्राम में एक से अधिक पंचायत बन रहे हो |
पंचायत मुख्यालय सामान्यतः सर्वाधिक जनसंख्या वाले ग्राम में स्थापित किया जाता है। विशेष परिस्थितियों में अधिसूचित प्रावधानों के अनुसार अन्य उपयुक्त ग्राम का चयन किया जा सकता है।
ग्राम पंचायत की कुल जनसंख्या के आधार पर वार्डों का गठन किया जाता है। सामान्यतः लगभग 500 जनसंख्या पर एक वार्ड निर्धारित किया जाता है।
नहीं। प्रत्येक वार्ड संबंधित राजस्व ग्राम की सीमा के भीतर ही बनाया जाता है तथा किसी अन्य राजस्व ग्राम का क्षेत्र उसमें शामिल नहीं किया जाता।
पंचायत समिति का एक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र सामान्यतः लगभग 5,000 जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
जिला परिषद का एक सदस्य लगभग 50,000 की निकटतम जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रारूप प्रकाशन का उद्देश्य प्रस्तावित परिसीमन की जानकारी आम नागरिक तक पहुँचाना तथा दावा एवं आपत्ति दर्ज कराने का अवसर प्रदान करना है। इससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी एवं न्यायसंगत बनती है।
निर्धारित अवधि के भीतर कोई भी नागरिक, जनप्रतिनिधि अथवा संबंधित हितधारक दावा या आपत्ति प्रस्तुत कर सकता है। आवेदन ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से स्वीकार किए जाते हैं।
दावा-आपत्ति एवं अपीलों के निस्तारण के बाद प्रमंडलीय आयुक्त की पुष्टि (Validation) उपरांत जिला गजट में अंतिम प्रकाशन होने पर परिसीमन प्रक्रिया पूर्ण मानी जाती है।
त्रिस्तरीय पंचायतों के परिसीमन कार्य का निर्देशन, नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है। आयोग निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार संपूर्ण प्रक्रिया का संचालन सुनिश्चित करता है।
जिला दंडाधिकारी त्रिस्तरीय पंचायतों के परिसीमन कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं। वे निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन, सत्यापन, प्रारूप प्रकाशन एवं अंतिम प्रकशन की कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।
प्रमंडलीय आयुक्त परिसीमन कार्य का पर्यवेक्षण, परीक्षण एवं जिला दंडाधिकारी द्वारा भेये गये प्रस्ताब की पुष्टि करते हैं।
अनुमंडल पदाधिकारी अपने क्षेत्र के प्रखंडों में परिसीमन कार्य का अनुश्रवण करते हैं तथा चयनित पंचायतों का क्षेत्रीय सत्यापन कर प्रतिवेदन जिला पदाधिकारी को उपलब्ध कराते हैं। साथ ही वे उनके समक्ष दावा/आपति की प्रथम अपील दायर की जा सकती है
प्रखंड विकास पदाधिकारी प्रखंड स्तर पर परिसीमन कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं। वे प्रस्तावों का सत्यापन, क्षेत्र निरीक्षण तथा निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन सुनिश्चित करते हैं। साथ ही दावा/आपति प्राप्त कर सुनबाई भी करते हैं|
पंचायत स्तर पर प्रारंभिक परिसीमन कार्य पंचायत सचिव, राजस्व कर्मचारी एवं अंचल अमीन द्वारा किया जाता है। आवश्यकता होने पर तकनीकी कर्मियों की सहायता भी ली जा सकती है।
ग्राम पंचायत गठन के लिए प्रखंड (Block) को मूल प्रशासनिक इकाई माना गया है। प्रत्येक ग्राम पंचायत केवल एक ही प्रखंड के अंतर्गत होगी।
पंचायत क्षेत्र का निर्धारण सामान्यतः उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर क्रमवार किया जाता है। इससे क्षेत्रीय निरंतरता एवं प्रशासनिक स्पष्टता बनी रहती है।
पंचायत क्षेत्र निर्धारण में भौगोलिक निरंतरता, जनसंख्या संतुलन, प्राकृतिक सीमाएँ एवं संपर्क का विशेष ध्यान रखा जाता है।
सामान्यतः पंचायत का नाम उसके मुख्यालय ग्राम के नाम पर रखा जाता है। एक राजस्ब ग्रामसेअधिक बनने पर पंचायत उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम अथवा मध्य जैसे दिशा-सूचक शब्द जोड़े जा सकते हैं।
नहीं। प्रत्येक ग्राम पंचायत केवल एक ही विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत होगी तथा उसका क्षेत्र दो विधानसभा क्षेत्रों में विभाजित नहीं किया जाएगा।
वार्ड गठन ग्राम पंचायत के परिसीमन के बाद कुल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। सामान्यतः ५०० की जसंख्या पर एक वार्ड का गठन किया जाता है
वार्डों का संख्यांकन उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर क्रमवार किया जाता है। प्रत्येक वार्ड को क्रम संख्या देकर उसकी स्पष्ट पहचान सुनिश्चित की जाती है।
पंचायत समिति निर्वाचन क्षेत्रों का गठन भौगोलिक निरंतरता एवं प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखकर किया जाता है। सामान्यतः किसी वार्ड का विभाजन नहीं किया जाता है।
जिला परिषद निर्वाचन क्षेत्रों के गठन में प्रखंड (Block) को मूल इकाई माना जाता है।
प्रारूप प्रकाशन से पूर्व परिसीमन प्रस्ताव, मानचित्र, जनसंख्या विवरण एवं अन्य अभिलेख तैयार कर उनका सत्यापन किया जाता है। तत्पश्चात आवश्यक अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
प्रारूप प्रकाशन की सूचना लाउडस्पीकर, समाचार-पत्र, सोशल मीडिया, प्रेस नोट एवं अन्य प्रचार माध्यमों से व्यापक रूप से प्रसारित की जाती है।
प्राप्त प्रत्येक दावा एवं आपत्ति की जाँच कर निर्धारित अवधि के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाता है। स्वीकृत मामलों में आवश्यक संशोधन तथा अस्वीकृत मामलों में अपील का अवसर दिया जाता है।
वार्ड पंचायत की मूल निर्वाचन इकाई है। इसलिए निर्वाचन क्षेत्रों का गठन इस प्रकार किया जाता है कि किसी वार्ड का विभाजन न हो और प्रशासनिक निरंतरता बनी रहे।
पंचायत समिति के मानचित्र के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का संख्यांकन उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा में क्रमवार किया जाता है। इससे सभी निर्वाचन क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान सुनिश्चित होती है।
जिला परिषद निर्वाचन क्षेत्रों का गठन जिले में संतुलित एवं समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है। प्रत्येक सदस्य लगभग समान जनसंख्या (50,000)का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रारूप प्रकाशन के माध्यम से प्रस्तावित परिसीमन जनता के समक्ष रखा जाता है। इससे नागरिकों को सुझाव, दावा एवं आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त होता है।
निर्धारित समय-सीमा के भीतर प्रथम एवं द्वितीय अपील की व्यवस्था उपलब्ध है। अपीलों का निस्तारण सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियमानुसार किया जाता है। प्रथम अपील अनुमंडल पदाधिकारी एवं दितीय अपील जिला दंडाधिकारी के समक्ष दायर की जा सकती है
दावा, आपत्ति एवं अपीलों के परीक्षण के उपरांत जिला दंडाधिकारी द्वारा पारित आदेश अंतिम एवं बाध्यकारी माना जाता है। इसके आधार पर आवश्यक संशोधन किए जाते हैं।
अंतिम अनुमोदन के उपरांत निर्वाचन क्षेत्रों का प्रकाशन जिला गजट में किया जाता है। इसके साथ ही परिसीमन प्रक्रिया विधिवत पूर्ण मानी जाती है।
समान प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि प्रत्येक निर्वाचित सदस्य यथासंभव समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे। इससे निर्वाचन क्षेत्रों के बीच संतुलन एवं निष्पक्षता बनी रहती है।